Bhasha (Language)(भाषा)

भाषा (Bhasha) और हिंदी भाषा (Hindi Bhasha)

भाषा – प्रकृति और प्रयोजन – भाषा का मानव के मुख से निकली वे सार्थक ध्वनियाँ हैं जो दूसरों तक अपनी बात पहुँचाने का काम करती हैं। मुख से निकलने वाली ये ध्वनियाँ अर्थपूर्ण शब्दों का निर्माण करती हैं। इन शब्दों से वाक्यों की रचना होती है, जिनके माध्यम से हम अपने भावों और विचारों को प्रकट करते हैं। वाक्य ही भाषा की लघुतम सार्थक इकाई है। वस्तुतः ज्ञानार्जन और अभिव्यक्ति का सबसे सरल साधन भाषा ही है। इस प्रकार भाषा सामाजिक व्यवहार की वस्तु है, क्योंकि इसका संबंध जीवन के सभी पक्षों और अनुभवों से होता है। भाषा के ही माध्यम से सभी सामाजिक व्यवहार और क्रियाकलाप संपन्न होते हैं।

भाषा का मुख्य कार्य वक्ता की बात को दूसरों तक पहुँचाना है। भाषा के माध्यम से मनुष्य बोलकर ही नहीं लिखकर भी अपने विचार दूसरों तक पहुंचाता है। इस प्रकार भाषा के दो रूप हैं – मौखिक और लिखित। भाषा का मूल रूप मौखिक ही है।

भाषा (Bhasha)- व्यवस्था और व्याकरण

भाषा ध्वनि प्रतीकों (शब्दों) की एक व्यवस्था है। इसमें शब्द एक दूसरे के साथ व्यवस्थित रूप से जड़े होते हैं। प्रत्येक भाषा की अपनी व्यवस्था होती है और प्रत्येक भाषिक व्यवस्था के अपने नियम होते हैं। भाषा की
इस व्यवस्था के नियमों को ही ‘व्याकरण’ कहते हैं। व्याकरण के द्वारा भाषा के स्वरूप की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। उससे भाषा के शुद्ध और अशुद्ध रूपों की पहचान होती है |हम व्याकरण से भाषा का मानक प्रयोग सीखते है | व्याकरण-सम्मत मानक रूप को ही भाषा का शुद्ध रूप माना जाता है |

व्याकरण सीखने के बाद मनुष्य भाषा की प्रकृति को समझकर उसे शुद्ध रूप में बोलने, लिखने, पढ़ने और समझने लगता है | वह भाषा के प्रयोग में कम से कम अशुद्धि करता है। इस प्रकार भाषा में एकरूपता बनाए रखने में व्याकरण बहुत उपयोगी होता है।

भाषा की व्यवस्था को सीखने-समझने के लिए व्याकरण का अध्ययन किया जाता है। व्याकरण के चार मुख्य भाग हैं –

1. वर्ण व्यवस्था |
2. शब्द व्यवस्था |
3. पद व्यवस्था |
4. वाक्य व्यवस्था।

1. वर्ण व्यवस्था – इसके अंतर्गत वर्षों के उच्चारण, लेखन और संयोजन के नियमों की चर्चा की जाती है।

2. शब्द व्यवस्था – इसमें शब्दों के स्रोत, भेद, रूप तथा रचना का अध्ययन किया जाता है।

3. पद व्यवस्था – वाक्य में प्रयुक्त शब्द पद कहलाता है। पद व्यवस्था के अंतर्गत पद तथा उसके भेदों तथा रचना आदि का अध्ययन किया जाता है।

4. वाक्य व्यवस्था – इसके अंतर्गत वाक्य-संरचना (पदों का क्रम, अन्विति, पदबंध, उपवाक्य), वाक्य-भेद, वाक्य-रूपांतरण तथा विराम-चिह्नों का अध्ययन किया जाता है।

हिंदी भाषा (Hindi Bhasha)और उसकी बोलियाँ

भारत में बहुत-सी भाषाएँ बोली जाती हैं। असमियाँ, उड़िया, व कन्नड़ कश्मीरी, कोंकणी, गुजराती, डोगरी, बोडो, मैथिली, तमिल, तेलुगु ,नेपालीपंजाबी, बँगला, मणिपुरी, मराठी, मलयालम, संस्कृत , सिंधी ,संथाली ,उर्दू और हिंदी संविधान में स्वीकृत बाईस भारतीय भाषाएँ हैं। इन सब भाषाओ का प्रयोग सामान्यतः अपने-अपने क्षेत्रों में होता है, किन्तु हिंदी का प्रयोग पूरे भारत में होता है। संविधान के अनुसार हिंदी भारत सरकार की राजभाषा है और अखिल भारतीय स्तर पर संपर्क भाषा भी है।

हिंदी का अर्थ हिंद की भाषा है और यह भाषा पूरे भारत में अन्य भाषाओ की अपेक्षा अधिक व्यापक रूप से बोली और समझी जाती है। हिंदी शब्द फ़ारसी भाषा से आया है। ‘हिंद’ शब्द का प्रयोग पहले सिंधु नदी और सिंधु देश (सिंध) के लिए होता था । फ़ारसी में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ की भाँति होता है। इसी कारण ‘सिंधु’ के स्थान पर ‘हिंदु’ शब्द का प्रयोग होने लगा और यहाँ की भाषा हिंदी कहलाई।

हिंदी भाषा देश की राजभाषा के साथ-साथ बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तरांचल, छत्तीसगढ़, झारखंड और अंडमान-निकोबार की भी राजभाषा है। इनमें
अंडमान-निकोबार को छोड़कर अन्य राज्य हिंदी भाषी राज्य कहलाते हैं।पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वी मध्य प्रदेश में अवधी, भोजपुरी, मगही, मैथिली, छत्तीसगढ़ी और बघेली बोलियाँ बोली जाती हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी मध्य प्रदेश में ब्रज, कन्नौजी, खड़ी बोली, बांगरू, बुंदेली, मेवाड़ी, मेवाती, मारवाड़ी, ढूँढारी आदि बोलियाँ प्रचलित हैं। हिमाचल प्रदेश तथा उत्तरांचल की प्रमुख बोलियाँ हिमाचली, गढ़वाली और कुमाऊँनी हैं। ये सभी बालियाँ अपने-अपने क्षेत्रों में मातृभाषा के रूप में बोली जाती हैं।

हिदी उत्तर भारत के अतिरिक्त दक्षिण में हैदराबाद, औरंगाबाद,गुलबर्गा, बीदर आदि अनेक क्षेत्रों में भी बोली जाती है, इसे ‘दक्खिनी हिंदी’कहते है |इसके अतिरिक्त पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र आदि में भी हिंदी भाषा का प्रयोग होता है। पर्वांचल के राज्यों में भी हिंदी का प्रयोग बढ़ रहा है। भारत के पड़ोसी देशों – पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका आदि में हिंदी खूब बोली और समझी जाती है।मॉरीशस फीज़ी, त्रिनिडाड, सिंगापुर, सूरीनाम आदि देशों में भी हिंदी का प्रचलन है।

इस दृष्टि से हम यह कह सकते हैं कि हिंदी पूरे भारत की संपर्क भाषा तो है ही, यह विदेशों में भी बोली जाती है और अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में विकसित हो रही है।

हिंदी का मानक रूप

स्पष्ट है कि हिंदी भाषा का क्षेत्र अत्यंत विशाल और व्यापक है। हिंदी भाषी राज्यों के अतिरिक्त अन्य राज्यों में भी हिंदी का अन्य भाषा के रूप में प्रयोग होता है। इसलिए हिंदी के अनेक रूप उभरने लगे हैं। अनेक रूपों के कारण कभी-कभी भावों और विचारों को समझने में कई प्रकार की कठिनाइयाँ हो सकती हैं। इसलिए संप्रेषणीयता और अर्थग्रहण की दृष्टि से भाषा को सर्वग्राह्य बनाने के लिए उसमें एकरूपता लाना आवश्यक होता है। बोलचाल के स्तर पर हिंदी के कई रूप प्रचलित होने के बावजूद हिंदी का अपना स्वीकृत मानक रूप भी है। मानक रूप से सबसे बड़ा लाभ यह है कि जहाँ कहीं भी हिंदी का प्रयोग होता है वहाँ इसी मानक रूप को स्वीकार किया जाता है।

मानक भाषा के रूप में हिंदी अपनी क्षेत्रीय सीमाओं को पार कर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में विकसित हो रही है। परिणामस्वरूप, अपनी बोलियों के शब्दों के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं से तथा
अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी जैसी विदेशी भाषाओं से भी बड़ी संख्या में आए शब्द हिंदी में घुल-मिल गए हैं। हिंदी भाषा जितनी अधिक व्यापक और बहुप्रचलित है, उतनी ही अधिक समृद्ध भी। इसी दृष्टि से भारत के संविधान के अनुच्छेद 351 में यह लिखा गया है –

“संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।”

इसका अभिप्राय यह है कि हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को ग्रहण कर अपने-आप को समृद्ध करेगी तथा भारत की अनेक संस्कृतियों के मिले-जुले रूप को अभिव्यक्त कर सकेगी। संविधान की भावना के अनुरूप हिंदी का विकास हो रहा है तथा भाषा-नीति के क्रियान्वयन के लिए उसके शिक्षण-प्रशिक्षण के भी अनेक कार्यक्रम चला रहे हैं। हिंदी को देश के विद्यालयों में कहीं प्रथम भाषा के रूप में, कहीं द्वितीय भाषा के रूप में और कहीं तृतीय भाषा के रूप में पढ़ाए जाने की व्यवस्था है।

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